वो रौशनी ही क्या रौशनी जिसमें वो न दिखे,
वो हुस्न ही क्या हुस्न जो रौशनी में दिखे।
दिखे तो फिर वो इस तरह दिखे,
कि रूह-ए-मुकम्मल बे-रौशनी दिखे।
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